भारत का राजकोषीय घाटा फरवरी 2026 तक FY26 लक्ष्य का 80.4%

परिचय

फरवरी 2026 के अंत तक, भारत का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit), जो सरकार के वित्तीय स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित पूर्ण-वर्ष के लक्ष्य का 80.4% तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स (Controller General of Accounts - CGA) द्वारा जारी किया गया है, और यह इंगित करता है कि सरकार की उधारी अपने वार्षिक अनुमान के एक महत्वपूर्ण हिस्से तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा प्रतियोगी परीक्षा, विशेषकर UPSC, SSC, Banking और Railway की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था, सरकारी बजट और सार्वजनिक वित्त की स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण करंट अफेयर्स का एक हिस्सा है। यह हमें बताता है कि सरकार अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कितनी उधार ले रही है और इसका अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

मुख्य विवरण

राजकोषीय घाटा, सीधे शब्दों में कहें तो, सरकार के कुल व्यय और उसके कुल राजस्व (उधार को छोड़कर) के बीच का अंतर है। यह आंकड़ा सरकार की कुल उधारी आवश्यकता को दर्शाता है। फरवरी 2026 तक 80.4% का आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित लक्ष्य की तुलना में है, जो अक्सर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है (उदाहरण के लिए, FY26 के लिए GDP का 5.1% लक्ष्य)। आमतौर पर, वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों में सरकार का खर्च बढ़ जाता है, जिससे घाटा भी बढ़ता है। राजस्व संग्रह में वृद्धि के बावजूद, सरकार के व्यय को पूरा करने के लिए बाजार से या अन्य स्रोतों से उधार लेना पड़ता है। फरवरी 2026 तक का यह आंकड़ा दर्शाता है कि सरकार अपने राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) के मार्ग पर बनी हुई है, लेकिन वित्तीय वर्ष के अंत तक इसे लक्ष्य के भीतर रखने के लिए सचेत प्रयासों की आवश्यकता होगी। इसमें टैक्स कलेक्शन में सुधार और गैर-जरूरी खर्चों पर नियंत्रण जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

भारत में राजकोषीय घाटा प्रबंधन हमेशा से एक महत्वपूर्ण नीतिगत चुनौती रही है। 2003 में लागू हुए राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (Fiscal Responsibility and Budget Management - FRBM) अधिनियम का उद्देश्य सरकार के राजकोषीय घाटे और ऋण को कम करना था ताकि दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, कोविड-19 महामारी के दौरान, सरकार को अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए बड़े पैमाने पर खर्च करना पड़ा, जिससे राजकोषीय घाटा काफी बढ़ गया था। उसके बाद से, सरकार ने धीरे-धीरे इसे कम करने का लक्ष्य रखा है, जिसका उद्देश्य FY26 तक इसे एक निश्चित प्रतिशत (उदाहरण के लिए 5.1%) तक लाना था। राजस्व के मुख्य स्रोत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर (जैसे GST) हैं, जबकि व्यय मुख्य रूप से बुनियादी ढांचे के विकास, रक्षा, सब्सिडी, ब्याज भुगतान और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर होता है। राजकोषीय घाटे का उच्च स्तर देश की उधार लेने की क्षमता, ब्याज दरों और मुद्रास्फीति पर दबाव डाल सकता है।

प्रभाव और महत्व

फरवरी 2026 तक राजकोषीय घाटे का यह स्तर अर्थव्यवस्था के लिए कई निहितार्थ रखता है। पहला, उच्च घाटा सरकार की उधारी आवश्यकताओं को बढ़ाता है, जिससे निजी क्षेत्र के लिए ऋण उपलब्ध कराने हेतु कम संसाधन बचते हैं (जिसे Crowding Out Effect कहा जाता है)। दूसरा, यह सरकारी बॉन्ड यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव डाल सकता है, जिससे उधारी की लागत बढ़ जाती है। तीसरा, यदि घाटा अधिक बना रहता है, तो यह मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि सरकार का बढ़ा हुआ खर्च अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त तरलता (Liquidity) डालता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, भारत के राजकोषीय स्वास्थ्य की निगरानी रेटिंग एजेंसियां ​​करती हैं, और एक नियंत्रित घाटा देश की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, जो विदेशी निवेश को आकर्षित करता है। सरकार के लिए, इस घाटे को प्रबंधित करना एक नाजुक संतुलन है - विकास को बढ़ावा देने के लिए खर्च करना और साथ ही वित्तीय विवेक बनाए रखना। यह सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों को सार्वजनिक वित्त और आर्थिक नीतियों के इंटरकनेक्शन को समझने में मदद करेगा।

परीक्षा के लिए महत्व

  • UPSC: Prelims में आर्थिक संकेतक, सरकारी बजट और FRBM अधिनियम से संबंधित प्रश्न आ सकते हैं। Mains (GS-III) में भारतीय अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक वित्त, राजकोषीय नीति और वित्तीय समेकन पर विस्तृत विश्लेषण पूछा जा सकता है। यह राजकोषीय घाटे के कारणों और प्रभावों की समझ प्रदान करता है।
  • SSC: General Awareness सेक्शन में आर्थिक शब्दावली (जैसे Fiscal Deficit, GDP), सरकारी वित्त और CGA जैसी संस्थाओं से संबंधित प्रश्न शामिल हो सकते हैं। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
  • Banking: IBPS PO, SBI PO और अन्य बैंकिंग परीक्षाओं के लिए यह अत्यंत प्रासंगिक है। वित्तीय जागरूकता (Financial Awareness) और अर्थव्यवस्था सेक्शन में आर्थिक संकेतक, सरकारी उधारी, मुद्रास्फीति और RBI की मौद्रिक नीति पर इसके प्रभाव से संबंधित प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
  • Railway: General Knowledge और भारतीय अर्थव्यवस्था सेक्शन में देश के आर्थिक स्वास्थ्य के प्रमुख संकेतक और सरकारी नीतियों से संबंधित प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  • प्रश्न 1: राजकोषीय घाटा क्या दर्शाता है? उत्तर: सरकार के कुल व्यय और कुल राजस्व (उधार को छोड़कर) के बीच का अंतर, यानी सरकार की कुल उधारी आवश्यकता।
  • प्रश्न 2: भारत में राजकोषीय घाटे के आंकड़े कौन जारी करता है? उत्तर: कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स (CGA)।
  • प्रश्न 3: FRBM अधिनियम का पूर्ण रूप क्या है? उत्तर: Fiscal Responsibility and Budget Management अधिनियम।

याद रखने योग्य तथ्य

  • फरवरी 2026 तक राजकोषीय घाटा: FY26 लक्ष्य का 80.4%
  • जारी करने वाली संस्था: कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स (CGA)
  • वित्तीय वर्ष: 2025-26
  • राजकोषीय घाटा सरकार की उधारी आवश्यकता को दर्शाता है।
  • यह आंकड़ा आर्थिक स्थिरता और सरकारी खर्च को प्रभावित करता है।

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